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मुक्त-ग़ज़ल : 234 - कर गया हैराँ.......

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दर्द को चुपचाप ही हमने सहा ; आँख से आँसू न कोई भी बहा ॥ हम जो सुनना चाहते थे उसने वो , ना ज़ुबाँ से औ’ न आँखों से कहा ॥ बुझ गए हम उसको देते देते आँच , वो पिघलकर भी नहीं लेकिन बहा ॥ बात तो थी फूटकर रोने की सच , मुँह से फूटा जाने क्यों इक क़हक़हा ? उससे करके दोस्ती पाला था इक , हमने सचमुच आस्तीं में अजदहा ॥ उसको है आवाज़ से नफ़्रत बड़ी , उसके कानों में न गा , मत चहचहा ॥ पाप धोना है तो पश्चात्ताप कर , सिर्फ़ गंगा–जमुना में ही मत नहा ॥

*मुक्त-मुक्तक : 871 - इश्क़ की तैयारियां

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छोड़कर आसानियाँ सब  माँगता दुश्वारियाँ वो ॥ चाहता सेहत नहीं क्यों  चाहता बीमारियाँ वो ॥ इक पुराना बेवफ़ा बस  भूलकर बैठा ही है इत ; उठके उत करने लगा  नए इश्क़ की तैयारियां वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति