मुक्त-ग़ज़ल : 233 - कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े



पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ लँगड़े ॥
प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,
बेवजह करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥
फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,
आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥
नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,
हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥
हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,
बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥
हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,
क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥
चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,
ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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