मुक्त-ग़ज़ल : 231 - ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन



ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥
राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥
याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ ,
सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को भुला के होते हैं ॥ 2 ॥
अपने पैरों को वो मेरे आँसुओं की धार से ,
ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन टप-टप धुला के होते हैं ॥ 3 ॥
सामने ही वो मेरे ; मेरे रक़ीबों को बड़े ,
प्यार से पास अपने ख़ुश हक़ से बुला के होते हैं ॥ 4 ॥
मैं तो जल उठता हूँ तब क़ागज़ सा जब अपना मुझे ,
हाथ मर्ज़ी से वो ख़ुश आपना छुला के होते हैं ॥ 5 ॥
अपने पत्थर के पहाड़ों को हमेशा ही बड़े ,
ख़ुश मेरे सर पे वो रख-रख कर ढुला के होते हैं ॥ 6 ॥
ख़ुद को सोने के हमेशा बाँट रखकर औ मुझे ,
बाँझ मिट्टी के डलों से ख़ुश तुला के होते हैं ॥ 7 ॥
मेरी नींदों के लिए वो जागते हैं तब कहीं ,
ख़ुश मुझे सब रात लोरी गा सुला के होते हैं ॥ 8 ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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