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Showing posts from April, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 232 - मीर के दीवान बिकते हैं ?

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कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं ॥ कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ॥ ख़रीदें ज्यों लतीफों की किताबें लोग हाथों हाथ , नहीं क्यों दाग़ , ग़ालिब , मीर के दीवान बिकते हैं ? कहीं पर लोग लोगों की बचा देते हैं जाँ यों ही , कहीं अपनों के अपनों पर किए एहसान बिकते हैं ॥ हवा मुँहमाँगी क़ीमत पे वहाँ बिकती है लेकिन मुफ़्त, अगरबत्ती , इतर , क़ाफ़ूर औ’ लोबान बिकते हैं ॥ अगर लग जाएँ ऊँची बोलियाँ तो फिर जहाँ में सच , याँ अच्छे अच्छों के हाँ दीं , ज़मीर , ईमान बिकते हैं ॥ ( लतीफों = चुटकुलों , दीवान = एक विशिष्ट प्रकार का ग़ज़ल संग्रह , इतर = इत्र , क़ाफ़ूर = कपूर , दीं = धर्म ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 231 - ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन

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ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥ राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥ याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ , सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को भुला के होते हैं ॥ 2 ॥ अपने पैरों को वो मेरे आँसुओं की धार से , ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन टप-टप धुला के होते हैं ॥ 3 ॥ सामने ही वो मेरे ; मेरे रक़ीबों को बड़े , प्यार से पास अपने ख़ुश हक़ से बुला के होते हैं ॥ 4 ॥ मैं तो जल उठता हूँ तब क़ागज़ सा जब अपना मुझे , हाथ वो मर्ज़ी से ख़ुश अपनी छुला के होते हैं ॥ 5 ॥ अपने पत्थर के पहाड़ों को हमेशा ही बड़े , ख़ुश मेरे सर पे वो रख-रख कर ढुला के होते हैं ॥ 6 ॥ ख़ुद को सोने के हमेशा बाँट रखकर औ’ मुझे ,