Friday, March 17, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 869 - लो सप्त रंग



लो सप्त रंग घोल-घोल साथ ले जाओ ॥
कलंकहीनों संग होली खेलकर आओ ॥
रँगे सियार रँगने में न रंग ख़र्च करो ,
न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।। आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।। ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दो...