*मुक्त-मुक्तक : 867 - दर खुला पिंजरे का रख



मुझसे बंदर को कहे कूदूँ न मैं , उछलूँ न मैं !
दर खुला पिंजरे का रख बोले कभी निकलूँ न मैं !
बर्फ़ हूँ यह जानकर दुश्मन मेरा मुझको पकड़ ,
धूप में रखकर ये कहता है मुझे पिघलूँ न मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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