मुक्त-ग़ज़ल : 230 - पूछना तुम तीन होली में ॥



उसका मन इस बार हम बन दीन होली में
दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में
श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग ,
करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में
जिनको गुब्बारा फुलाने में भी हो पीड़ा ,
उनसे बजवाएंगे नचने बीन होली में
उस हृदय की पीठिका में है शपथ हमको ,
होके दिखलाएंगे कल आसीन होली में
हारते आए जो कल तक देखना तुम कल ,
जीत का फहराएँगे हम चीन होली में
कब किसी रंगोत्सव में हम तनिक रत हों ,
पर रहें सच सर्वथा लवलीन होली में
हम उन्हे रँगकर रहेंगे चाहे वो आएँ ,
सूट पहने या महज कोपीन होली में
कोई प्रश्न हमसे करे चिढ़ जाते हैं हम पर ,
एक दो क्या पूछना तुम तीन होली में ॥
( चीन = झण्डा ,  कोपीन = लँगोट )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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