Sunday, March 12, 2017

ग़ज़ल : 230 - पूछना तुम तीन होली में ॥



उसका मन इस बार हम बन दीन होली में
दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में
श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग ,
करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में
जिनको गुब्बारा फुलाने में भी हो पीड़ा ,
उनसे बजवाएँँगे नचने बीन होली में
उस हृदय की पीठिका में है शपथ हमको ,
होके दिखलाएँँगे कल आसीन होली में
हारते आए जो कल तक देखना तुम कल ,
जीत का फहराएँगे हम चीन होली में
कब किसी रंगोत्सव में हम तनिक रत हों ,
पर रहें सच सर्वथा लवलीन होली में
हम उन्हे रँगकर रहेंगे चाहे वो आएँ ,
सूट पहने या कि बस कोपीन होली में
कोई प्रश्न हमसे करे चिढ़ जाते हैं हम पर ,
एक दो क्या पूछना तुम तीन होली में ॥
( चीन = झण्डा ,  कोपीन = लँगोट )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

No comments:

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...