मुक्त-ग़ज़ल : 229 - कटवा दूँ पैर



कब तक कि तेरी याद में आँखों को नम रखूँ ?
तू खुश है मुझ से दूर तो क्यों मैं भी ग़म रखूँ ?
मेरे सिवा भी तेरे हैं दो एक और अगर ,
फिर क्या बुरा जो मैं भी दो अपने सनम रखूँ ?
कोई भी दर हो जिससे दे उठा कोई मुझे ,
कटवा दूँ पैर पर न फिर वहाँ क़दम रखूँ ॥
चाहे जरूरतों से ज़ियादा न हो मगर ,
सामाँ ज़रूर एक भी न उससे कम रखूँ ॥
मज़्बूरियाँ कुछ ऐसी हैं कि एक हाथ में ,
बंदूक को रखूँ तो दूजे में कलम रखूँ ॥
हालात ने मुझ मोम को लोहा बना दिया ,
हूँ काँच भी तो हीरा काटने का दम रखूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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