मुक्त-ग़ज़ल : 228 - जाम–ए–शराब



तुम सा न कोई बाग़ में है दूसरा गुलाब सच ॥
तुम दिन का आफ़्ताब रात का हो माहताब सच ॥
मैं जब नशे में इश्क़ के हूँ चूर – चूर तो भला ,
फिर कैसे ले लूँ हाथ में मैं जाम–ए–शराब सच ?
पढ़ने समझने से ही इल्म हो हमें मगर ग़ज़ब ,
उनको हो रखने भर से हाथ में ज़रा किताब सच ॥
वैसे तो चाहता हूँ उनको मैं फ़क़त करूँ मना ,
मज़्बूरियाँ हैं उनको बोलने की जी जनाब सच ॥
दिखने के रेगज़ारे थार ओ सहारा वो दरअस्ल ,
झेलम औ व्यास , रावी औ सतलज औ' हैं चनाब सच ॥
क्या ओढ़नी मैं सर की तेरे क्या दुपट्टा सीने का ,
तैयार हूँ मैं बनने तेरे पाँव की जुराब सच ॥
करता हूँ तुझसे पूछ मत मैं ठीक–ठीक कितना प्यार ?
झूठा लगेगा तुझको जो भी दूँगा मैं हिसाब सच ॥
( आफ़्ताब = सूर्य , माहताब = चंद्रमा , इल्म = ज्ञान , फ़क़त = केवल , रेगज़ारे थार ओ सहारा = थार और सहारा मरुस्थल , जुराब = मोज़ा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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