मुक्त-ग़ज़ल : 227 - भूनता है तलता है ॥




कोई कछुआ तो कोई सिंह समान चलता है ॥
कोई शीशे सा कोई बर्फ़ सा पिघलता है ॥
हस्ति के आगे क्या पिपीलिका है पर सोचो ,
सूर्य है सूर्य वैसे दीप भी तो जलता है ॥
कोई पाहन हथौड़ी – छैनी से बने मानव ,
कोई साँचों में गल के देवता में ढलता है ॥
अंत सबका है सुनिश्चित महान मृत्युंजय –
जाप कितने भी तुम करालों ये न टलता है ॥
कोई खाए संभल – संभल के चल के भी ठोकर ,
और खा – खा के कोई ठोकरें संभालता है ॥
जग हुआ उलटा पकाते हैं शेर अब सब्जी ,
बैल खाने को माँस भूनता है तलता है ॥
सत्य रहता सड़क पे ज्यों अवैध संतति हो ,
और युवराज सा महलों में झूठ पलता है ॥
एक फिरता है नंगा कड़कड़ाती सर्दी में ,
दूजा मौसम में लू के कंबल ओढ़ चलता है ॥
( हस्ति = हाथी , पिपीलिका = चींटी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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