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डॉ.हीरालाल प्रजापति का '' कविता विश्व ''

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डॉ. हीरालाल प्रजापति का काव्य-पाठ


Dr.Hiralal Prajapati , Itarsi ( MP)
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*मुक्त-मुक्तक : 870 - दाँतों को पीस

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दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥ खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥ इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम , इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 869 - लो सप्त रंग

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लो सप्त रंग घोल–घोल साथ ले जाओ ॥ कलंकहीनों के सँग होली खेलकर आओ ॥ रँगे सियारों को रँगने में रँग न ख़र्च करो , न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 868 - किसी का मौन

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किसी की चीख़ और ना फिर  किसी का मौन रोकेगा ॥ न हिन्दू सिक्ख ईसाई  न जैन औ’ जौन रोकेगा ॥ जब ऊग आएँगे मेरी पीठ  पर दो पंख उड़ने को , मुझे छूने से फिर आकाश  बोलो कौन रोकेगा ॥ ( जौन = यवन या मुसलमान ) डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 867 - दर खुला पिंजरे का रख

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मुझसे बंदर को कहे कूदूँ न मैं , उछलूँ न मैं ! दर खुला पिंजरे का रख बोले कभी निकलूँ न मैं ! बर्फ़ हूँ यह जानकर दुश्मन मेरा मुझको पकड़ , धूप में रखकर ये कहता है मुझे पिघलूँ न मैं !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति

होली मुक्तक : मुझे चुमकार होली में ॥

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रहूँगा मैं नहीं तैयार खाने मार होली में ॥ लगा फटकार निसदिन पर मुझे चुमकार होली में ॥ तू मुझसे दूर रहले साल भर भी मत मुझे तक तू , लगा कस – कस गले मुझको मगर हर बार होली में ॥ न जाने क्या हुआ मुझको अरे इस बार होली में ? मैं चंगा था यकायक पड़ गया बीमार होली में ॥ हसीना इक मैं जैसी चाहता था सामने आकर , लगी करने जो मेरा एकटक दीदार होली में । हमेशा ही रहा करता हूँ मैं तैयार होली में ॥ अगर चाहे तो तू तेरी क़सम इस बार होली में ॥ बहुत लंबी , बहुत चौड़ी , बहुत ऊँची गिरा दे वो – हमारे दरमियाँ है जो खड़ी दीवार होली में ॥ भले काँटों का ही पहना तू लेकिन हार होली में ॥ दिखावे को ही कर लेकिन फ़क़त कर प्यार होली में ॥

मुक्त-ग़ज़ल : 230 - पूछना तुम तीन होली में ॥

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उसका मन इस बार हम बन दीन होली में ॥ दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में ॥ श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग, करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में ॥ जिनको गुब्बाराफुलाने में भी हो पीड़ा , उनसे बजवाएंगे नचने बीन

मुक्त-ग़ज़ल : 229 - कटवा दूँ पैर

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कब तक कि तेरी याद में आँखों को नम रखूँ ? तू खुश है मुझ से दूर तो क्यों मैं भी ग़म रखूँ ? मेरे सिवा भी तेरे हैं दो एक और अगर , फिर क्या बुरा जो मैं भी दो अपने सनम रखूँ ? कोई भी दर हो जिससे दे उठा कोई मुझे , कटवा दूँ पैर पर न फिर वहाँ क़दम रखूँ ॥ चाहे जरूरतों से ज़ियादा न हो मगर , सामाँ ज़रूर एक भी न उससे कम रखूँ ॥ मज़्बूरियाँ कुछ ऐसी हैं कि एक हाथ में , बंदूक को रखूँ तो दूजे में कलम रखूँ ॥ हालात ने मुझ मोम को लोहा बना दिया , हूँ काँच भी तो हीरा काटने का दम रखूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 228 - जाम–ए–शराब

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तुम सा न कोई बाग़ में है दूसरा गुलाब सच ॥ तुम दिन का आफ़्ताब रात का हो माहताब सच ॥ मैं जब नशे में इश्क़ के हूँ चूर – चूर तो भला , फिर कैसे ले लूँ हाथ में मैं जाम–ए–शराब सच ? पढ़ने समझने से ही इल्म हो हमें मगर ग़ज़ब , उनको हो रखने भर से हाथ में ज़रा किताब सच ॥ वैसे तो चाहता हूँ उनको मैं फ़क़त करूँ मना , मज़्बूरियाँ हैं उनको बोलने की ‘ जी जनाब ‘ सच ॥ दिखने के रेगज़ारे थार ओ सहारा वो दरअस्ल , झेलम औ’ व्यास , रावी औ’ सतलज औ' हैं चनाब सच ॥ क्या ओढ़नी मैं सर की तेरे क्या दुपट्टा सीने का , तैयार हूँ मैं बनने तेरे पाँव की जुराब सच ॥ करता हूँ तुझसे पूछ मत मैं ठीक–ठीक कितना प्यार ? झूठा लगेगा तुझको जो भी दूँगा मैं हिसाब सच ॥

मुक्त-ग़ज़ल : 227 - भूनता है तलता है ॥

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