*मुक्त-ग़ज़ल : 226 - अजब कर रहा है ॥



न जाने वो क्या किस सबब कर रहा है ?
मगर इतना तै है गज़ब कर रहा है ॥
वही जाने क्या उसका मक़सद है लेकिन ,
लगे है कि वो कुछ अजब कर रहा है ॥
वो ख़ुद अपने मुंसिफ़ से अपने गुनह की ,
सज़ा आगे बढ़ – बढ़ तलब कर रहा है ॥
करे जितनी सूरज की इज्ज़त वो उतना ,
चिराग़ों का भी बढ़ अदब कर रहा है ॥
वो अपने नहीं ग़ैर के ख़्वाब को सच ,
बनाने का हर एक ढब कर रहा है ॥
बहुत धीरे – धीरे मगर जाने जाँ को ,
वो अपनी ही अब अपना रब कर रहा है ॥
फ़क़त रूह का मेरी तालिब वो बंदा ,
मेरा जिस्म भी अब तलब कर रहा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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