*मुक्त-ग़ज़ल : 225 - हीरा हूँ मैं



हीरा हूँ मैं वो मुझको अच्छे से जानता है ॥
फिर भी हमेशा मुझमें नर्मी तलाशता है ॥
जिस कान ने न मुझको सुनने की ली क़सम है ,
मेरा गला उसी को आवाज़ मारता है ॥
वह कबसे आस्माँ में सूराख़ को बनाने ,
बेकार में ही दिन भर पत्थर उछालता है ॥
मुझमें बड़ी - बड़ी जो वो ख़ूबियाँ न देखे ,
चुन - चुन के छोटी - छोटी कमियाँ निकालता है ॥
रहता वो चुप ही या फिर करता है बात ऐसे ,
जैसे भड़ास कोई अपनी निकालता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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