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Showing posts from February, 2017

*मुक्त-ग़ज़ल : 226 - अजब कर रहा है ॥

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न जाने वो क्या किस सबब कर रहा है ? मगर इतना तै है गज़ब कर रहा है ॥ वही जाने क्या उसका मक़सद है लेकिन , लगे है कि वो कुछ अजब कर रहा है ॥ वो ख़ुद अपने मुंसिफ़ से अपने गुनह की , सज़ा आगे बढ़ – बढ़ तलब कर रहा है ॥ करे जितनी सूरज की इज्ज़त वो उतना , चिराग़ों का भी बढ़ अदब कर रहा है ॥ वो अपने नहीं ग़ैर के ख़्वाब को सच , बनाने का हर एक ढब कर रहा है ॥ बहुत धीरे – धीरे मगर जाने जाँ को , वो अपनी ही अब अपना रब कर रहा है ॥ फ़क़त रूह का मेरी तालिब वो बंदा , मेरा जिस्म भी अब तलब कर रहा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

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माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥ और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥ तितलियाँ माँगूँ तो देना तितलियाँ लाकर । चीटियाँ माँगूँ तो देना चीटियाँ लाकर । सौंपना चूहा ही यदि चूहा मंगाऊँ मैं , मत कभी उसकी जगह हाथी मुझे देना ॥ माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥ और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥ फूल माँगा जाए तो कलियाँ न ले आना । फल मंगाया जाए तो फलियाँ न ले आना । चाहिए कोंपल तो देना मत मुझे पत्ता , मैं तना माँगूँ तो मत डाली मुझे देना ॥ माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥ और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

*मुक्त-ग़ज़ल : 225 - हीरा हूँ मैं

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हीरा हूँ मैं वो मुझको अच्छे से जानता है ॥ फिर भी हमेशा मुझमें नर्मी तलाशता है ॥ जिस कान ने न मुझको सुनने की ली क़सम है , मेरा गला उसी को आवाज़ मारता है ॥ वह कबसे आस्माँ में सूराख़ को बनाने , बेकार में ही दिन भर पत्थर उछालता है ॥ मुझमें बड़ी - बड़ी जो वो ख़ूबियाँ न देखे , चुन - चुन के छोटी - छोटी कमियाँ निकालता है ॥ रहता वो चुप ही या फिर करता है बात ऐसे , जैसे भड़ास कोई अपनी निकालता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति