*मुक्त-ग़ज़ल : 224 - मैं इश्क़ में मानूँ



वो दैर जाता कभी दिखे तो कभी हरम को ॥
भुला के आता हूँ मैक़दे में मैं अपने ग़म को ॥
वो मानता कब ख़ुदा किसी को सिवा ख़ुदा के ,
मैं इश्क़ में मानूँ अपना रब अपने ही सनम को ॥
वो रह्म दिल है मैं कैसे मानूँ तरस रहा जब ,
कई ज़मानों से उसके मुझ पर किसी करम को ॥
मैं इंतज़ार उसका करते - करते थका हूँ इतना ,
कि सच लगे है पहुँच न जाऊँ अभी अदम को ॥
हमें मिटाकर मिली मसर्रत उन्हे किलो भर ,
मिली हैं मिटकर के उनसे खुशियाँ टनों से हमको ॥
हमेशा कमज़ोरियों पे उसकी नज़र पड़ी है ,
मेरी निगाहों ने जब भी देखा तो देखा दम को ॥
न होता उससे जो दिल का रिश्ता तो झेलता क्या ,
मैं उसके हँस – हँस के अपने दिल पे किये सितम को ?
जो माँगता हूँ वो दे – दे मुझको मैं मान लूँगा ,
ज़ियादा से भी ज़ियादा तेरे ज़ियादा कम को ॥
( दैर = मंदिर , हरम = मस्जिद , मैक़दे = मदिरालय , अदम = यमलोक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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