*मुक्त-ग़ज़ल : 223 - तुम मेरी बाँहों में कुछ पल



या मेले में सँग मेरे कल्लोलो तो ॥
या एकांत में कांधे सर धर रो लो तो ॥
सुनकर तुमको बहरापन मेरा जाता ,
क्यों चुप हो ? संकेतों से ही बोलो तो ॥
क्यों रहते हो कुछ दिन से गुमसुम-गुमसुम ?
क्या रहस्य है अपने मन का ? खोलो तो ॥
तुम चट्टान हो तो मैं भी इक पर्वत हूँ ,
मैं भी डिग जाऊँगा यदि तुम डोलो तो ॥
मुझको मिल जाएगा स्वर्ग धरा पर ही ,
तुम मेरी बाँहों में कुछ पल सो लो तो ॥
मैं सम्पूर्ण तुम्हारा हो जाऊँगा सच ,
तुम थोड़े बस थोड़े मेरे हो लो तो ॥
मुझ पर मैल लगा है कोई दाग़ नहीं ,
निष्कलंक हो जाऊँगा यदि धो लो तो ॥
सप्त रँगों से क्या तुम से तो मैं हँस-हँस ,
रँगवा लूँ ख़ुद को कालिख भी घोलो तो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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