*मुक्त-ग़ज़ल : 222 - वो परिंदे



जितना आँखों से उसको हटाता गया ॥
उतना दिल में वो मेरे समाता गया ॥
यों वो आया था देने तसल्ली मगर ,
जाते - जाते मुझे फिर रुलाता गया ॥
क्या कहूँ रहनुमा ही मेरी राह में ,
जाल बुन-बुन के गिन-गिन बिछाता गया ॥
वो परिंदे जो मुश्किल से फाँसे गए ,
सारे सय्यादों के वो छुड़ाता गया ॥
एक ही आग के दो असर देखिए ,
मैं बुझाता रहा ; वो जलाता गया ॥
कैसे रहता सलामत मेरे पास कुछ ,
मैं बनाता रहा वो मिटाता गया ॥
इस क़दर मैंने गुस्सा दिलाया उसे ,
गालियाँ ; गाने वाला सुनाता गया ॥
रौ में इक दिन नशे की वो बहकर मुझे ,
हर दबा राज़ दिल का बताता गया ॥
पेट भरने की ख़ातिर वो मुफ़्लिस चने ,
रोज़ लोहे के चुन – चुन चबाता गया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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