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Showing posts from January, 2017

गीत : तुम क्या जानो दुख पायल का ?

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तुम क्या जानो दुख पायल का , तुमको तो छन – छन से मतलब ? चूड़ी कितनी चिटके – टूटे , तुमको बस खन – खन से मतलब ? तुमको बस अच्छे लगते वो मेंढक जो टर्राते हैं सच । गाने वालों  से ज़्यादा प्रिय तुमको जो चिल्लाते हैं सच । तुमको कोयल की कूकें , बुलबुल के नग्में कब जँचते रे ? टकराहट से निकले कर्कश - स्वर ही तुमको भाते हैं सच । तुम क्या समझो ठुकती कीलों के माथे की पीड़ा को हाँ ?

ग़ज़ल : 224 - मैं इश्क़ में मानूँ

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वो दैर जाता कभी दिखे तो कभी हरम को ॥ भुला के आता हूँ मैक़दे में मैं अपने ग़म को ॥ वो मानता कब ख़ुदा किसी को सिवा ख़ुदा के , मैं इश्क़ में मानूँ अपना रब अपने ही सनम को ॥ वो रह्म दिल है मैं कैसे मानूँ तरस रहा जब , कई ज़मानों से उसके मुझ पर किसी करम को ॥ मैं इंतज़ार उसका करते - करते थका हूँ इतना , कि सच लगे है पहुँच न जाऊँ अभी अदम को ॥ हमें मिटाकर मिली मसर्रत उन्हे किलो भर , मिली हैं मिटकर के उनसे खुशियाँ टनों से हमको ॥ हमेशा कमज़ोरियों पे उसकी नज़र पड़ी है , मेरी निगाहों ने जब भी देखा तो देखा दम को ॥ न होता उससे जो दिल का रिश्ता तो झेलता क्या , मैं उसके हँस-हँस के अपने दिल पे किये सितम को ?

ग़ज़ल : 223 - तुम मेरी बाँहों में कुछ पल

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या मेले में सँग मेरे कल्लोलो तो ।। या एकांत में कांधे सर धर रो लो तो ।।1।। सुनकर तुमको बहरापन मेरा जाता , क्यों चुप हो ? संकेतों से ही बोलो तो ।।2।। क्यों रहते हो कुछ दिन से गुमसुम-गुमसुम ? भेद है जो अपने मन में सब खोलो तो ।।3।। तुम चट्टान हो तो मैं भी इक पर्वत हूँ , मैं भी डिग जाऊँगा यदि तुम डोलो तो ।।4।। मुझको मिल जाएगा स्वर्ग धरा पर ही , तुम मेरी बाँहों में कुछ पल सो लो तो ।।5।। मैं सम्पूर्ण तुम्हारा हो जाऊँगा सच , तुम थोड़े बस थोड़े मेरे हो लो तो ।।6।। मुझ पर मैल लगा है कोई दाग़ नहीं , निष्कालिख हो जाऊँगा यदि धो लो तो ।।7।। सप्त रँगों से क्या तुम से तो मैं हँस-हँस , रँगवा लूँ ख़ुद को कालिख भी घोलो तो ।।8।।

कितने अकबर ओ कितने सिकंदर हुए

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कितने अकबर ओ कितने सिकंदर हुए ॥ आख़िरश मौत को सब मयस्सर हुए ॥
जेब किसके कफ़न में हुआ आज तक ,
वो हुए शाह या धुर फटीचर हुए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 222 - वो परिंदे

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जितना आँखों से उसको हटाता गया ।। उतना दिल में वो मेरे समाता गया ।।1।। यों वो आया था देने तसल्ली मगर , जाते - जाते मुझे फिर रुलाता गया ।।2।। क्या कहूँ रहनुमा ही मेरी राह में , जाल बुन-बुन के गिन-गिन बिछाता गया ।।3।। वो परिंदे जो मुश्किल से फाँसे गए , सारे सय्यादों के वो छुड़ाता गया ।।4।। एक ही आग के दो असर देखिए , मैं बुझाता रहा ; वो जलाता गया ।।5।। कैसे रहता सलामत मेरे पास कुछ , मैं बनाता रहा वो मिटाता गया ।।6।। इस क़दर मैंने ग़ुस्सा दिलाया उसे , गालियाँ ; गाने वाला सुनाता गया ।।7।। रौ में इक दिन नशे की वो बहकर मुझे , हर दबा राज़ दिल का बताता गया ।।8।।