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ग़ज़ल : 247 - परदेस में

देस से परदेस में आकर हुआ मैं ।। सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ।।1।। रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री , सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ।।2।। कब रहा काँटा मैं ग़ुस्से में भी कल तक , प्यार में भी आजकल ख़ंजर हुआ मैं ।।3।। हो गया था आदमी जानूँ न कैसे , फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ।।4।। एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे , कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ।।5।। देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग , मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ।।6।।
( यायावर = घुमक्कड़ , nomad ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति


ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......

हैराँ हूँ ; लँगड़े , चीतों सी तेज़ चाल लेकर ।। चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ।।1।। हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ , आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ।।2।। चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी , जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ  ढाल लेकर ।।3।। हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो , बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ।।4।। माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को , कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ।।5।। कुछ माँगने चला हूँ तो ये मुफ़ीद होगा , जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ।।6।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति


ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।। बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ।।1।। धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ? सुख के साये में हमेशा ही पला वो ।।2।। फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी , दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ।।3।। है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया , दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ।।4।। जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर , आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ।।5।। आज के हालात ने ही उसको बदला , कल तलक इंसान था सच , इक भला वो ।।6।। राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ? जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ।।7।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 244 - मामूली मकान

कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ।। सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ।।1।। उसकी आवाज़ की न पूछ क्या है लज़्ज़त सच , उसके मुँह से तो गाली भी अजान लगती है ।।2।। एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े , भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ।।3।। करती सबका है क़त्ल वो निगाहों से अपनी , सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ।।4।। है वो बेमिस्ल , लाजवाब , है जुदा सबसे , वो न इस जैसी , वो न उस समान लगती है ।।5।। वो क़िला है , वो शानदार इक महल अंदर , सिर्फ़ बाहर से मामुली मकान लगती है ।।6।। जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,
मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ।।7।।
( बेमिस्ल = बेमिसाल , अद्वितीय  / मामुली = मा 'मूली , साधारण ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ

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नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।।    गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।।    ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,    मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ।।2।।    कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,    भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।3।।    कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,    मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ।।4।।    तड़पकर भूख से मज्बूर हो इक शेर का कोई ,    कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ।।5।।     ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।। पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।। एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।। हड्डियों सा हूँ कभी , मैं बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।। काठ का पहिया हो यदि तुम , मैं भी लोहे का धुरा हूँ ।।4।। सबके दाँतों को हूँ कंकड़ , तुम्हें , चबाने मुरमुरा हूँ ।।5।। सबको गंगा-जल उन्हेंं ही , महुए की कच्ची सुरा हूँ ।।6।। अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब मैं चुराने से चुरा हूँ ।।7।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना

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राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥ मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥ मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से , दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥ मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया , मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥ ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का , अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥ मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश , अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥ दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई , मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥ ( तलातुम = बाढ़ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी

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हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ।। कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ।।1।। कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा , मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ।।2।। दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो , है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ।।3।। उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो , तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ।।4।।
नाज़ुकी में वो गुलाबी पंखुरी से नर्म है ,
और सख़्ती में है कोहेनूर सी वो गुलबदन ।।5।। ( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ

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मग़्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ।। अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ।।1।। हो गया हूँ आज मीठा पान उनका , जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ।।2।। पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू , मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ।।3।। मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम-ढम , घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ।।4।। जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब , अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ।।5।। जिसको पाने जान तक की की न पर्वा , आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ।।6।। जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे , दाल , गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी

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गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥ नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥ देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को , तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है

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खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥ सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !! जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥ क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ? तुझसे सीखे कोई सौदागरी का फ़न आकर ॥ आईने बेचे तू अंधों के शहर में जाकर !! दिल तिजोरी में करके बंद अपना बिन खो के ॥ इश्क़ करता तू यों सर्पों से नेवला हो के !! लोमड़ी आके तेरे द्वार पे भरती पानी ॥ तेरा चालाकियों में दूसरा कहाँ सानी ? तुझसा जीने का हुनर किसने आज तक जाना ? मैंने उस्ताद अपना तुझको आज से माना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥

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बारिश में बहते नालों ख़ुद को नदी न समझो ।। लम्हा तलक नहीं तुम ख़ुद को सदी न समझो ।।1।। अच्छे के वास्ते गर हो जाए कुछ बुरा भी , बेहतर है उस ख़राबी को फिर बदी न समझो ।।2।। दिखने में मुझसा अहमक़ बेशक़ नहीं मिलेगा , लेकिन दिमाग़ से मुझ को गावदी न समझो ।।3।। पौधा हूँ मैं धतूरे का भूलकर भी मुझको , अंगूर गुच्छ वाली लतिका लदी न समझो ।।4।। जिसको वरूँगी मेरा पति बस वही रहेगा , सीता हूँ मैं मुझे तुम वह द्रोपदी न समझो ।।5।। (बदी = पाप , अहमक़ = भोंदू , गावदी = बेवकूफ़ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 237 - दोपहर में रात

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एक घटिया टाट से उम्दा वो मलमल हो गए ।। हंस से हम हादसों में पड़के गलगल हो गए ।।1।। हो गए शीतल सरोवर बूँद से वो और हम , रिसते - रिसते टप - टपकते तप्त मरुथल हो गए ।।2।। शेर की थे गर्जना ,सागर की हम हुंकार थे , आजकल कोयल कुहुक ,नदिया की कलकल हो गए ।।3।। पार लोगों को लगाने कल तलक बहते थे जो , अब धँसाकर मारने वाला वो दलदल हो गए ।।4।। सच ; जो दिल की खलबली का अम्न थे , आराम थे , धीरे - धीरे अब वही कोहराम हलचल हो गए ।।5।। इक ज़रा सी भूल से हम उनके दिल से हाय रे , दोपहर में रात के तारों से ओझल हो गए ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति