Posts

Showing posts from 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 247 - परदेस में.........

देस से परदेस में आकर हुआ मैं ॥ सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ॥ रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री , सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ॥ कब रहा काँटा मैं गुस्से में भी कल तक , प्यार में भी आजकल खंजर हुआ मैं ॥ हो गया था आदमी जानूँ न कैसे , फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ॥ एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे , कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ॥ देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग , मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......

हैराँ हूँ लँगड़े चीतों सी तेज़ चाल लेकर ॥ चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ॥ हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ , आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ॥ चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी , जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ  ढाल लेकर !! हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो , बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ॥ माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को , कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ॥ कुछ माँगने चला हूँ तो लाज़मी यही है , जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

एक पतला जानकार पापड़ तला वो ॥ बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ॥ धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ? सुख के साये में हमेशा ही पला वो ॥ फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी , दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ॥ है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया , दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ॥ जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर , आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ॥ आज के हालात ने ही उसको बदला , कल तलक इंसान था इक सच भला वो ॥ राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ? जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 244 - जर्जर मकान

कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ॥ सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ॥ उसकी आवाज़ की लज़्ज़त की पूछ मत तारीफ़ , गंदी गाली भी उसकी इक अजान लगती है ॥ एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े , भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ॥ करती फिरती है निगाहों से सबके क़त्ल मगर , सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ॥ लाजवाब है वो बेमिसाल है जुदा है वो , वो न इस जैसी न उसके समान लगती है ॥ है वो मज़्बूत क़िला , ताज सा महल अंदर , सिर्फ़ बाहर से वो जर्जर मकान लगती है ॥ जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,                                             मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ.....

Image
नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,    मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,    भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,    मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ॥    बहुत मज़्बूर होकर भूख से जंगल के राजा हो _    कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ॥     ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )    -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥ पिन नहीं पैना छुरा हूँ ॥ एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ॥ हड्डियों सा हूँ कभी , कभी _ बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ॥ काठ का पहिया हो गर तुम , मैं भी लोहे का धुरा हूँ ॥ सबके दाँतों को हूँ कंकड़ , तुझ चबाने मुरमुरा हूँ ॥ सबको गंगा-जल उन्हे ही , महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥ अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब मैं चुराने से चुरा हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना

Image
राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥ मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥ मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से , दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥ मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया , मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥ ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का , अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥ मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश , अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥ दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई , मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥ ( तलातुम = बाढ़ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी......

Image
हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ॥ कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ॥ कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा , मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ॥ दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो , है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ॥ उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो , तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ॥ ( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ

Image
मग्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ॥ अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ॥ हो गया हूँ आज मीठा पान उनका , जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ॥ पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू , मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ॥ मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम - ढम , घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ॥ जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब , अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ? जिसको पाने जान तक की की न पर्वा , आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ॥ जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे , दाल – गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ॥

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी

Image
गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥ नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥ देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को , तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है

Image
खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥ सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !! जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥ क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ? तुझसे सीखे कोई सौदागरी का फ़न आकर ॥ आईने बेचे तू अंधों के शहर में जाकर !! दिल तिजोरी में करके बंद अपना बिन खो के ॥ इश्क़ करता तू यों सर्पों से नेवला हो के !! लोमड़ी आके तेरे द्वार पे भरती पानी ॥ तेरा चालाकियों में दूसरा कहाँ सानी ? तुझसा जीने का हुनर किसने आज तक जाना ? मैंने उस्ताद अपना तुझको आज से माना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥

Image
बारिश में बहते नालों  ख़ुद को नदी न समझो ॥ लम्हा तलक नहीं तुम  ख़ुद को सदी न समझो ॥ अच्छे के वास्ते गर  हो जाए कुछ बुरा भी , बेहतर है उस ख़राबी  को कुछ बदी न समझो ॥ दिखने में मुझसा अहमक़  बेशक़ नहीं मिलेगा , लेकिन दिमाग़ से मुझ  को गावदी न समझो ॥ पौधा हूँ मैं धतूरे  का भूलकर भी मुझको , अंगूर गुच्छ वाली  लतिका लदी न समझो ॥