Wednesday, December 28, 2016

ग़ज़ल : 221 - तुझमें ज़िद आर्ज़ू की




उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ।।
हाँ जवानी तुम्हारी सँभलती रहे ।।1।।
अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर ,
तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ।।2।।
मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी ,
पाँव बिन भी ग़ज़ब तेज़ चलती रहे ।।3।।
सेंक ले अपनी रोटी तू बेशक़ मगर ,
दाल मेरी भी यों कर कि गलती रहे ।।4।।
भैंस होगी न गोरी भले रात-दिन ,
गोरेपन की सभी क्रीम मलती रहे ।।5।।
आदतन आँख पीरी में भी इश्क़ की ,
हुस्न की चिकनी तह पर फिसलती रहे ।।6।।
इश्क़ की आग इक बार लग जाए फिर ,
गहरे पानी में भी धू-धू जलती रहे ।।7।।
तू मिले ना मिले दिल में हसरत मगर ,
चाहता हूँ तेरी मुझमें पलती रहे ।।8।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...