*मुक्त-ग़ज़ल : 220 - शर्म बैठी है पर्दों में


जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ॥
उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ॥
उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ ,
हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ॥
बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला ,
दिलरुबा जिसको ख़्वाबों में भी ना दिखे ?
शर्म बैठी है पर्दों में छिपके कहीं ,
बेहयाई नकाबों में भी ना दिखे ॥
ढूँढो सहराइयों में न तहज़ीब तुम ,
अब सलीका जनाबों में भी ना दिखे ॥
अक़्ल उनको कहीं से भी मिलती नहीं ,
इल्म उनको किताबों में भी ना दिखे ॥
( हसीं चश्म = सुनयन , सहराइयों = असभ्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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