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इक जनवरी को मैं !!

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न काटे से कटूँ ; चीरे चिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न ही घेरे किसी ग़म के घिरूँ , इक जनवरी को मैं !! न पूछो क्या है मुझसे राज़ लेकिन झूठ ना बोलूँ , किसी भी साल की नचता फिरूँ , इक जनवरी को मैं !! रहूँ चाहे बहुत बीमार सा , इक जनवरी को मैं !! न चल पाऊँ किसी दीवार सा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ शीशे सा चकनाचूर , गन्ने सा पिरा लेकिन , मनाता हूँ किसी त्योहार सा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ ख़ुश या बला का ग़मज़दा , इक जनवरी को मैं !! मगर तुम देख लेना यह सदा , इक जनवरी को मैं !! रहूँ मस्रूफ़ या फुर्सत , रहूँ घर पर या फिर बाहर , चला आता हूँ खिंचकर मैक़दा , इक जनवरी को मैं !! फँसा था सच फटे से हाल में , इक जनवरी को मैं !!

*मुक्त-ग़ज़ल : 221 - तुझमें ज़िद आर्ज़ू की

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उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ॥ हाँ जवानी तुम्हारी  सम्हलती रहे ॥ अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर , तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ॥ मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी , पाँव बिन भी ग़ज़ब तेज़ चलती रहे ॥ सेंक ले अपनी रोटी तू बेशक़ मगर , दाल मेरी भी यों कर कि गलती रहे ॥ भैंस होगी न गोरी भले रात-दिन , गोरेपन की सभी क्रीम मलती रहे ॥ आदतन आँख पीरी में भी इश्क़ की , हुस्न की चिकनी तह पर फिसलती रहे ॥ इश्क़ की आग इक बार लग जाए फिर , गहरे पानी में भी धू-धू जलती रहे ॥ तू मिले न मिले दिल में हसरत मगर , चाहता हूँ तेरी मुझमें पलती रहे-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 220 - शर्म बैठी है पर्दों में

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जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ॥ उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ॥ उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ , हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ॥ बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला , दिलरुबा जिसको ख़्वाबों में भी ना दिखे ? शर्म बैठी हैपर्दों में छिपके कहीं , बेहयाई नकाबों में भी ना दिखे ॥ ढूँढो सहराइयों में न तहज़ीब तुम , अब सलीका जनाबों में भी ना दिखे ॥ अक़्ल उनको कहीं से भी मिलती नहीं , इल्म उनको किताबों में भी ना दिखे ॥ ( हसीं चश्म = सुनयन , सहराइयों = असभ्य ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति