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Showing posts from November, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 219 - खा-खा कर ॥

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अपनों से बैठे खफ़ा हैं खार खा-खा कर ॥ घूँट पीते ख़ून का खूंख़्वार खा-खा कर ॥ बेबसी में जो न खाना था वही जाँ को ; हम बचाते पड़ गए बीमार खा-खा कर ॥ इस क़दर मज़्बूर हैं हम प्यास से अपनी ; सच बुझाते हैं इसे अंगार खा-खा कर ॥ जीतने को और भी अपनी कमर कसते ; दुश्मनों से हम क़रारी हार खा-खा कर ॥ टीन सी उसकी हुई खाल अपने मालिक से ; चाबुकों की मार हज़ारों बार खा-खा कर ॥ क्या हुआ वो चार दिन के चार भूखे बस ; उठ गए थाली से लुक़्में चार खा-खा कर ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 866 - ये तेरा जिस्म

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तू सिर से पाँव तक बेशक निहायत खूबसूरत है ॥
ये तेरा जिस्म संगेमरमरी कुदरत की मूरत है ॥
नहीं बस नौजवानों की , जईफ़ों की भी अनगिनती ;
तू सचमुच मलिका-ए-दिल है , मोहब्बत है , ज़रूरत है ॥
(जईफ़ों = वृद्धों )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति