*मुक्त-मुक्तक : 864 - मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥

रात–दिन इस ही जगह पर न थके बैठा हूँ ॥
कब से अपलक मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥
चलके मत आ कि उड़के आ जा सामने मेरे ,
तेरे दीदार का प्यासा न छके बैठा हूँ ॥
( तके = देखते हुए , दीदार का = दर्शन का , छके = तृप्त )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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