*मुक्त-मुक्तक : 862 - बाग़ ही बाग़ हैं



रेगज़ारों में भी बरसात की फुहारें हैं ॥
बाग़ ही बाग़ हैं फूलों की रहगुजारें हैं ॥
जब थीं आँखें थे सुलगते हुए सभी मंज़र ,
जब से अंधे हुए हैं हर तरफ़ बहारें हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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