*मुक्त-ग़ज़ल : 218 - जंगलों की आग बन जा

उनके दिल में कर न तू बसने की तैयारी ॥
उनकी नज़रों में कोई पहले ही है तारी ॥
जंगलों की आग बन जा या तू बड़वानल ,
वो तुझे समझेंगे फिर भी सिर्फ़ चिंगारी ॥
इससे बचके रहना ही इसका इलाज होता ,
मत लगा दिल को मोहब्बत जैसी बीमारी ॥
रख खुली खिड़की औ रोशनदान वरना दम -
घोंट के रख देगी तेरा चार दीवारी ॥
रह्न रख दे अपनी सारी मिल्कियत लेकिन ,
छोड़ना मत क़र्ज़ की ख़ातिर तू खुद्दारी ॥
तेरी मर्ज़ी कर ले अपने साथ तू धोख़ा ,
मत कभी अपने वतन से करना ग़द्दारी ॥
साथ उनके मौत सिर पर ज़ुल्फ जैसी थी ,
उनके बिन तो ज़िंदगी भी बोझ है भारी ॥
( तारी = छाया हुआ ,बड़वानल = समुद्र के अंदर जलती हुई आग ,रह्न = गिरवी ,मिल्कियत = धन-संपत्ति ,खुद्दारी = स्वाभिमान ,ज़ुल्फ = केश , बाल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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