*मुक्त-ग़ज़ल : 217 - नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा '

कि सिर फोड़कर या कि पैरों में पड़कर ॥
मुक़द्दर से जीता यहाँ कौन लड़कर ?
जिन्हें मिलना है वो भी मिलकर रहेंगे ,
बिछड़ना है जिनको रहेंगे बिछड़कर ॥
हमेशा नहीं रहते क़ाबिज़ वहाँ पर ,
गिरें शाख़ से पत्ते पतझड़ में झड़कर ॥
रहोगे अगर रेगमालों में फिर तो ,
किसी ना किसी दिन रहोगे रगड़कर ॥
नदी की तरह सीख ही लेना बहना ,
या पोखर के जैसे ही रह जाना सड़कर ॥
अपने हैं जितने वही अपनी दुनिया ,
लिहाज़ा न अपनों से रहना अकड़कर ॥
वो क्यों छटपटा छूटने को हो आतुर ,
मोहब्बत ने जिसको रखा हो जकड़कर ?
नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा ',
वो जँचता है दरअस्ल ज़ेवर में जड़कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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