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Showing posts from October, 2016

ग़ज़ल : 218 - जंगलों की आग बन जा

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उनके दिल में कर न तू बसने की तैयारी ।। उनकी नज़रों में कोई पहले ही है तारी ।।1।। जंगलों की आग बन जा या तू बड़वानल , वो तुझे समझेंगे फिर भी सिर्फ़ चिंगारी ।।2।। इससे बचके रहना ही इसका इलाज होता , मत लगा दिल को मोहब्बत जैसी बीमारी ।।3।। रख खुली खिड़की औ’ रोशनदान वरना दम - घोंट के रख देगी तेरा चार दीवारी ।।4।। रह्न रख दे अपनी सारी मिल्कियत लेकिन , छोड़ना मत क़र्ज़ की ख़ातिर तू खुद्दारी ।।5।। तेरी मर्ज़ी कर ले अपने साथ तू धोख़ा , मत कभी अपने वतन से करना ग़द्दारी ।।6।। साथ उनके मौत सिर पर ज़ुल्फ जैसी थी , उनके बिन तो ज़िंदगी भी बोझ है भारी ।।7।। ( तारी = छाया हुआ ,बड़वानल = समुद्र के अंदर जलती हुई आग ,रह्न = गिरवी ,मिल्कियत = धन-संपत्ति ,खुद्दारी = स्वाभिमान ,ज़ुल्फ = केश , बाल ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 865 - उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥

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पढ़ो तो फ़लसफे की दो अहम किताबें हैं ॥ जो पी सको तो ये न आब ; ये शराबें हैं ॥ मगर क़िले के बंद सद्र दर सी पलकों की ; अभी बड़ी उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥  ( फ़लसफ़ा = दर्शन ,अहम = महत्वपूर्ण ,आब = पानी ,सद्र दर = मुख्य दरवाजा ,नक़ाबें = पर्दा ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 864 - मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥

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रात–दिन इस ही जगह पर न थके बैठा हूँ ॥ कब से अपलक मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥ चलके मत आ कि बस उड़के ही चला आ आगे , तेरे दीदार का प्यासा न छके बैठा हूँ ॥ ( तके = देखते हुए , दीदार का = दर्शन का , छके = तृप्त ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 863 - दिल की बात ?

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दो-चार-दस न बीस साल बल्कि ताहयात ॥ करवट बदल-बदल के,जाग-जाग सारी रात ॥ समझोगे कैसे तुम दिमाग़दारों ख़ब्त में ; मैंने तो की है शायरी में सिर्फ़ दिल की बात ? ( ताहयात = सारा जीवन , ख़ब्त = पागलपन ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 862 - बाग़ ही बाग़ हैं

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रेगज़ारों में भी बरसात की फुहारें हैं ॥ बाग़ ही बाग़ हैं फूलों की रहगुज़ारें हैं ॥ जब थीं आँखें थे सुलगते हुए सभी मंज़र , जब से अंधे हैं हुए हर तरफ़ बहारें हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 217 - नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा '

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कि सिर फोड़कर या कि पैरों में पड़कर ।। मुक़द्दर से जीता यहाँ कौन लड़कर ?1।। जिन्हें मिलना है वो भी मिलकर रहेंगे , बिछड़ना है जिनको रहेंगे बिछड़कर ।।2।। हमेशा नहीं रहते क़ाबिज़ वहाँ पर , गिरें शाख़ से पत्ते पतझड़ में झड़कर ।।3।। रहोगे अगर रेगमालों में फिर तो , किसी ना किसी दिन रहोगे रगड़कर ।।4।। नदी की तरह सीख ही लेना बहना , या पोखर के जैसे ही रह जाना सड़कर ।।5।। कि अपने हों जितने वही अपनी दुनिया , लिहाज़ा न अपनों से रहना अकड़कर ।।6।। वो क्यों छटपटा छूटने को हो आतुर , मोहब्बत ने जिसको रखा हो जकड़कर ?7।। नहीं कोई हाथों में रखता है ' हीरा ', वो जँचता है दरअस्ल ज़ेवर में जड़कर ।।8।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति