*मुक्त-मुक्तक : 859 - दुश्मन की है तारीफ़



मेरी हर तक्लीफ़ हर मुश्किल का यारों यक-ब-यक ,
उसने मेरे सामने हल चुटकियों में धर दिया ।।
आज उस दुश्मन की है तारीफ़ का मंशा बहुत ,
काम जिसने आज जानी दोस्त वाला कर दिया ।।
थी बहुत जिददो जहद थी कशमकश मैं क्या करूँ ?
सोचता रहता था बस ; फाँसी चढ़ूँ या कट मरूँ ?
जानता था ख़ुदकुशी करना है मुझको इसलिए ;
उसने आकर मेरे मुँह में जह्र लाकर भर दिया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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