*मुक्त-मुक्तक : 858 - मारते हैं वो ॥

कभी यूँ ही कभी ग़ुस्से में भरकर मारते हैं वो ॥
मगर तय है कि आते-जाते अक्सर मारते हैं वो ॥
झपटकर,छीनकर,कसकर,जकड़कर अपने हाथों से  ;
मेरे शीशा-ए-दिल पे खेंच पत्थर मारते हैं वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक