Saturday, September 3, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 857 - सड़कों पे दौड़े मछली



सड़कों पे दौड़े मछली कब ख़्वाहिश की मैंने ?
उड़ने की कब हाथी से फ़र्माइश की मैंने ?
लेकिन तेरी ख़ातिर मैं जो फूल न तोड़ सकूँ ;
तारे तोड़ के लाने की हर कोशिश की मैंने ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति


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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...