*मुक्त-मुक्तक : 857 - सड़कों पे दौड़े मछली

सड़कों पे दौड़े मछली कब ख़्वाहिश की मैंने ?
उड़ने की कब हाथी से फ़र्माइश की मैंने ?
लेकिन तेरी ख़ातिर मैं जो फूल न तोड़ सकूँ ;
तारे तोड़ के लाने की हर कोशिश की मैंने ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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