*मुक्त-ग़ज़ल : 216 - काश कोई कमाल हो जाए ॥

काश कोई कमाल हो जाए ॥
अम्न दिल में बहाल हो जाए ॥
गर वो सबके जवाब देता है ;
एक मेरा सवाल हो जाए ॥
जब नहीं खोदने को कुछ होता ;
नख ही मेरा कुदाल हो जाए ॥
कम से कम ग़म में वाइज़ों को भी ;
बादानोशी हलाल हो जाए ॥
ख़ुद को भी वो मिटा के रख दे गर ;
सिर्फ़ ग़ुस्से से लाल हो जाए ॥
उसके जाते ही एक बिन माँ के ;
मेरा बच्चे सा हाल हो जाए ॥
ज़ोरावर हैं वो कछुए जो सोचें ;
उनकी चीते सी चाल हो जाए ॥
इक कमाल इस तरह भी हो मेरा ;
तीर ही मेरी ढाल हो जाए ॥
है ये हसरत तमाम बोसों की ;
उनको तू होंठ-गाल हो जाए ॥
इस तरह से मरूँ कि दुनिया में ;
मेरा मरना मिसाल हो जाए ॥
अपने कुछ सोचते हैं अपनों का ;
कैसे जीना मुहाल हो जाए ॥
बच भी सकता है वो अगर उसकी ;
प्यार से देखभाल हो जाए ॥
झूल लेना तुम उसपे जी भर कर ;
जब वो टहनी से डाल हो जाए ॥
ठण्ड में कड़कड़ाती वो मेरा ;
आर्ज़ू है कि शाल हो जाए ॥
( वाइज़ों = धर्मोपदेशकों ,बादानोशी = शराबखोरी ज़ोरावर = बलवान , बोसों = चुम्मों आर्ज़ू = इच्छा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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