*मुक्त-ग़ज़ल : 215 - दे सका ना खिलौने

दे सका ना खिलौने रे बच्चों को मैं ॥
अपने नन्हें खिलौनों से बच्चों को मैं ॥
चाहता था कि दूँ चाँद – तारे उन्हें ,
हाय ! बस दे सका ढेले बच्चों को मैं ॥
माँगते थे वो रोटी तो देता रहा ,
मन के लड्डू सदा भूखे बच्चों को मैं ॥
पीटता था बुरों को कोई ग़म नहीं ,
डाँटता क्यों रहा अच्छे बच्चों को मैं ?
सोचता था कि बच्चे हरिश्चन्द्र हों ,
मानता सच रहा झूठे बच्चों को मैं ॥
इक पिता था समझता रहा फूल ही ,
धुर नुकीले , कड़े , पैने बच्चों को मैं ॥
रो दिया देखकर पेट को पालने ,
ईंट – गारे को सर ढोते बच्चों को मैं ॥
घर चलाते हैं बचपन से ही बन बड़े ,
बाप बोला करूँ ऐसे बच्चों को मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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