*मुक्त-ग़ज़ल : 214 - हैं अभी दीपक

हैं अभी दीपक ; कभी तो आफ़्ताब होंगे ॥
गर नहीं हम आज तो कल कामयाब होंगे ॥
दुरदुराओ मत हमें काग़ज़ के फूलों सा ;
देखना इक दिन हमीं अर्क़े गुलाब होंगे ॥
आज तक तो आबे ज़मज़म हैं मगर शायद ;
आपकी सुह्बत में हम कल तक शराब होंगे ॥
आज हम फाँकें चने तो तश्तरी में कल ;
क्या ज़रूरी है  नहीं शामी कबाब होंगे ?
भेड़िये जो खोल में रहते हैं गायों के ;
इक न इक दिन देखना ख़ुद बेनक़ाब होंगे ॥
आज कोई भी नहीं फ़न का हमारे पर ;
एक दिन मद्दाह सब आली जनाब होंगे ॥
 ( आफ़्ताब=सूर्य / दुरदुराना=उपेक्षा करना / आबे ज़मज़म=पवित्र जल / सुह्बत=संगति / मद्दाह=प्रशंसक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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