*मुक्त-ग़ज़ल : 213 - झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?

इश्क़ किया करने वाले ग़म ही पाते हैं लोग ॥ 
जानूँ न क्यों झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?
मैं तो मोहब्बत में ग़म खाकर भी चुप रहता मस्त ;
दोस्त मज़े चख-चख कर भी क्यों चिल्लाते हैं लोग ?
जह्र था उसमें जो खा बैठे सुनकर कितने हाय ;
मान के सच , सचमुच दहशत में मर जाते हैं लोग ॥
कुछ तो रखा करते ममियों का भी ज़िंदों सा ख़याल ;
और कई जीते जी ज़िंदे मरवाते हैं लोग ॥
मैं तो सहारा ले तिनकों का भी आ बैठूँ पार ;
जानूँ न कैसे कश्ती थामें बह जाते हैं लोग ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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