Sunday, September 4, 2016

ग़ज़ल : 213 - झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?



इश्क़ किया करने वाले ग़म ही पाते हैं लोग ॥ 
जानूँ न क्यों झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?
मैं तो मोहब्बत में ग़म खाकर भी चुप रहता मस्त ;
दोस्त मज़े चख-चख कर भी क्यों चिल्लाते हैं लोग ?
जह्र था उसमें जो खा बैठे सुनकर कितने हाय ;
मान के सच , सचमुच दहशत में मर जाते हैं लोग ॥
कुछ तो रखा करते ममियों का भी ज़िंदों सा ख़्याल ;
और कई जीते जी ज़िंदे मरवाते हैं लोग ॥
मैं तो सहारा ले तिनकों का भी आ बैठूँ पार ;
जानूँ न कैसे कश्ती थामें बह जाते हैं लोग ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...