*मुक्त ग़ज़ल : 212 - ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥

ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥
मौत सिल सी भी गल रही होगी ॥
वो उसे दे रहा दग़ा होगा ,
वो उसे कसके छल रही होगी ॥
रेंग अब भी वो चुप रहा होगा ,
चीख़-चिल्ला वो चल रही होगी ॥
बढ़ रहा होगा कोई महलों में ,
कोई कुटिया में पल रही होगी ॥
अपने साँचे में मुझको गढ़ फिर वो ,
मेरे साँचे में ढल रही होगी ॥
देखकर आज वो जो शर्मायी ,
मेरी महबूबा कल रही होगी ॥
जिसको वह गीत जैसा गाता था ,
वह ज़रूर इक ग़ज़ल रही होगी ॥
रेगमालों पे दौड़ने वाली ,
काई पे चल फिसल रही होगी ॥
भर बुढ़ापे में उसकी छाती पर ,
ज़िंदगी मूँग दल रही होगी ॥
मारके मुझको देखना जाकर ,
हाथ अपने वो मल रही होगी ॥
अपने बच्चों को ख़ुद उबलती माँ ,
पंखा गर्मी में झल रही होगी ॥
पूछता था वो क्यों सवाल उससे ,
शायद उसका वो हल रही होगी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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