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Showing posts from September, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 861 - किसी उँगली से अपनी

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खड़े हो , बैठ उकड़ूँ या कि औंधे लेट ; पर लिखना ॥ लिखे को काट कर या उसको पूरा मेट कर लिखना ॥ किसी उँगली से अपनी नाम मेरा तुम ज़रूर इक दिन ; मेरे चेहरे पे , सीनो पुश्त पे जी – पेट भर लिखना ॥ ( पर = परंतु , सीनो पुश्त = छाती और पीठ , जी = तबीअत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 860 - हैं भूखे हम बहुत

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नहीं ख़स्ता कचौड़ी के , नहीं तीखे समोसे के ॥ नहीं तालिब हैं हम इमली न ख़्वाहिशमंद डोसे के ॥ न लड्डू , पेड़ा , रसगुल्ला ; न रबड़ी के तमन्नाई ; हैं भूखे हम बहुत लेकिन तुम्हारे एक बोसे के ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 859 - दुश्मन की है तारीफ़

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मेरी हर तक्लीफ़ हर मुश्किल का यारों यक-ब-यक _ उसने मेरे सामने हल चुटकियों में धर दिया ॥ आज उस दुश्मन की है तारीफ़ का मंशा बहुत , काम जिसने आज जानी दोस्त वाला कर दिया ॥ थी बहुत जिददो जहद थी कशमकश मैं क्या करूँ ? सोचता रहता था बस ; फाँसी चढ़ूँ या कट मरूँ ? जानता था ख़ुदकुशी करना है मुझको इसलिए ; उसने आकर मेरे मुँह में जह्र लाकर भर दिया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 216 - काश कोई कमाल हो जाए ॥

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काश कोई कमाल हो जाए ॥ अम्न दिल में बहाल हो जाए ॥ गर वो सबके जवाब देता है ; एक मेरा सवाल हो जाए ॥ जब नहीं खोदने को कुछ होता ; नख ही मेरा कुदाल हो जाए ॥ कम से कम ग़म में वाइज़ों को भी ; बादानोशी हलाल हो जाए ॥ ख़ुद को भी वो मिटा के रख दे गर ; सिर्फ़ ग़ुस्से से लाल हो जाए ॥ उसके जाते ही एक बिन माँ के ; मेरा बच्चे सा हाल हो जाए ॥ ज़ोरावर हैं वो कछुए जो सोचें ; उनकी चीते सी चाल हो जाए ॥ इक कमाल इस तरह भी हो मेरा ; तीर ही मेरी ढाल हो जाए ॥ है ये हसरत तमाम बोसों की ; उनको तू होंठ-गाल हो जाए ॥ इस तरह से मरूँ कि दुनिया में ; मेरा मरना मिसाल हो जाए ॥ अपने कुछ सोचते हैं अपनों का ; कैसे जीना मुहाल हो जाए ॥ बच भी सकता है वो अगर उसकी ; प्यार से देखभाल हो जाए ॥ झूल लेना तुम उसपे जी भर कर ; जब वो टहनी से डाल हो जाए ॥

*मुक्त-ग़ज़ल : 215 - दे सका ना खिलौने

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दे सका ना खिलौने रे बच्चों को मैं ॥ अपने नन्हें खिलौनों से बच्चों को मैं ॥ चाहता था कि दूँ चाँद – तारे उन्हें , हाय ! बस दे सका ढेले बच्चों को मैं ॥ माँगते थे वो रोटी तो देता रहा , मन के लड्डू सदा भूखे बच्चों को मैं ॥ पीटता था बुरों को कोई ग़म नहीं , डाँटता क्यों रहा अच्छे बच्चों को मैं ? सोचता था कि बच्चे हरिश्चन्द्र हों , मानता सच रहा झूठे बच्चों को मैं ॥ इक पिता था समझता रहा फूल ही , धुर नुकीले , कड़े , पैने बच्चों को मैं ॥ रो दिया देखकर पेट को पालने , ईंट – गारे को सर ढोते बच्चों को मैं ॥ घर चलाते हैं बचपन से ही बन बड़े , बाप बोला करूँ ऐसे बच्चों को मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 214 - हैं अभी दीपक

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हैं अभी दीपक ; कभी तो आफ़्ताब होंगे ॥ गर नहीं हम आज तो कल कामयाब होंगे ॥ दुरदुराओ मत हमें काग़ज़ के फूलों सा ; देखना इक दिन हमीं अर्क़े गुलाब होंगे ॥ आज तक तो आबे ज़मज़म हैं मगर शायद ; आपकी सुह्बत में हम कल तक शराब होंगे ॥ आज हम फाँकें चने तो तश्तरी में कल ; क्या ज़रूरी है  नहीं शामी कबाब होंगे ? भेड़िये जो खोल में रहते हैं गायों के ; इक न इक दिन देखना ख़ुद बेनक़ाब होंगे ॥ आज कोई भी नहीं फ़न का हमारे पर ; एक दिन मद्दाह सब आली जनाब होंगे ॥  ( आफ़्ताब=सूर्य / दुरदुराना=उपेक्षा करना / आबे ज़मज़म=पवित्र जल / सुह्बत=संगति / मद्दाह=प्रशंसक ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 858 - मारते हैं वो ॥

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कभी यूँ ही कभी ग़ुस्से में भरकर मारते हैं वो ॥ मगर तय है कि आते-जाते अक्सर मारते हैं वो ॥ झपटकर,छीनकर,कसकर,जकड़कर अपने हाथों से  ; मेरे शीशा-ए-दिल पे खेंच पत्थर मारते हैं वो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 213 - झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?

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इश्क़ किया करने वाले ग़म ही पाते हैं लोग ॥  जानूँ न क्यों झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ? मैं तो मोहब्बत में ग़म खाकर भी चुप रहता मस्त ; दोस्त मज़े चख-चख कर भी क्यों चिल्लाते हैं लोग ? जह्र था उसमें जो खा बैठे सुनकर कितने हाय ; मान के सच , सचमुच दहशत में मर जाते हैं लोग ॥ कुछ तो रखा करते ममियों का भी ज़िंदों सा ख़याल ; और कई जीते जी ज़िंदे मरवाते हैं लोग ॥ मैं तो सहारा ले तिनकों का भी आ बैठूँ पार ; जानूँ न कैसे कश्ती थामें बह जाते हैं लोग ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 857 - सड़कों पे दौड़े मछली

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सड़कों पे दौड़े मछली कब ख़्वाहिश की मैंने ? उड़ने की कब हाथी से फ़र्माइश की मैंने ? लेकिन तेरी ख़ातिर मैं जो फूल न तोड़ सकूँ ; तारे तोड़ के लाने की हर कोशिश की मैंने ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त ग़ज़ल : 212 - ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥

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ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥ मौत सिल सी भी गल रही होगी ॥ वो उसे दे रहा दग़ा होगा , वो उसे कसके छल रही होगी ॥ रेंग अब भी वो चुप रहा होगा , चीख़-चिल्ला वो चल रही होगी ॥ बढ़ रहा होगा कोई महलों में , कोई कुटिया में पल रही होगी ॥ अपने साँचे में मुझको गढ़ फिर वो , मेरे साँचे में ढल रही होगी ॥ देखकर आज वो जो शर्मायी , मेरी महबूबा कल रही होगी ॥ जिसको वह गीत जैसा गाता था , वह ज़रूर इक ग़ज़ल रही होगी ॥ रेगमालों पे दौड़ने वाली , काई पे चल फिसल रही होगी ॥ भर बुढ़ापे में उसकी छाती पर , ज़िंदगी मूँग दल रही होगी ॥ मारके मुझको देखना जाकर , हाथ अपने वो मल रही होगी ॥ अपने बच्चों को ख़ुद उबलती माँ , पंखा गर्मी में झल रही होगी ॥ पूछता था वो क्यों सवाल उससे , शायद उसका वो हल रही होगी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति