Saturday, August 6, 2016

मुक्तक : 855 - मीठी झील तक गए ॥



कब अपने शहर की ही मीठी झील तक गए ॥
दो - चार - छः नहीं हजारों मील तक गए ॥
प्यासे थे इस क़दर कि सब कुएँ , तलाव पी ;
गंगो–जमन , चनाब , मिश्र – नील तक गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...