*मुक्त-मुक्तक : 855 - मीठी झील तक गए ॥

कब अपने शहर की ही मीठी झील तक गए ॥
दो - चार - छः नहीं हजारों मील तक गए ॥
प्यासे थे इस क़दर कि सब कुएँ , तलाव पी ;
गंगो–जमन , चनाब , मिश्र – नील तक गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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