*मुक्त-मुक्तक : 854 - इक आदमी लोहे का


टूटा न जो चाबुक की दमादम सड़ाक से ॥
टूटा न जो बिजली की भयंकर कड़ाक से ॥
इक आदमी लोहे का तेरी खा के गालियाँ ,
मानिंदे बुते शीशा वो टूटा तड़ाक से ॥
( दमादम = निरंतर , मानिंदे बुते शीशा = काँच के पुतले जैसा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक