*मुक्त ग़ज़ल : 211 : बेवफ़ा कलमुँहा ,मुँहजला इश्क़ है ॥

बेवफ़ा कलमुँहा , मुँहजला इश्क़ है ॥
किसने तुझसे कहा इक बला इश्क़ है ?1॥ 
हैं अगर कोई तो ; वो हैं आशिक़ बुरे ,
इश्क़ को मत बुरा कह ; भला इश्क़ है ॥2॥ 
है सुपाड़ी के जैसा कभी तो कभी ,
इक पके आम सा पिलपिला इश्क़ है ॥3॥ 
है मुंहासा कभी चाँद पे दाग़ सा ,
तो कभी तलवे का आबला इश्क़ है ॥4॥ 
आये अपनी पे जब सूर्य पर नाँ जले ,
नाँ हिमालय पे चढ़के गला इश्क़ है ॥5॥ 
है कभी बस ज़ुबाँ पे थिरकता हुआ ,
कभी दिल ही दिल में पला इश्क़ है ॥6॥ 
है कभी एक लू का थपेड़ा कभी ,
बाद गर्मी के पहला झला इश्क़ है ॥7॥ 
हुस्न के दर पे धरना दे बैठा हुआ ,
टालने से कभी नाँ टला इश्क़ है ॥8॥ 
है कभी ख़ुद के हाथों तराशा हुआ ,
कभी एक साँचा ढला इश्क़ है ॥9॥ 
नाँ कभी शाहराहों न गलियों पे बस ,
अपनी मंज़िल की रह पे चला इश्क़ है ॥10॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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