*मुक्त ग़ज़ल : 210 - सवाल इक पूछना है

सफ़र कर आ रहे हैं जो समंदर का महीनों से ;
किनारे आ के भी उतरें न अब वो ही सफ़ीनों से ॥
यक़ायक़ क्या हुआ जिनके लगे रहते थे पीछे ही ;
छुड़ाते दिख रहे पीछा वही अब उन हसीनों से ॥
हुए वो दिन हवा जब बाज सी नज़रें वो रखते थे ;
उन्हें दिखता नहीं अब पास का भी दूरबीनों से ॥
कि जो गुमनाम होते हैं क्या वो इंसाँ नहीं होते ?
सवाल इक पूछना है मुझको सारे नामचीनों से ॥
मोहब्बत से चले थे पालने नागों को बाँहों में ;
फ़क़त दो दिन में डस मारा मुओं ने आस्तीनों से ॥
मोहब्बत के बराबर वज़्न कोई भी नहीं होता ;
न दौलत से , न सीमोज़र न ये तुलती नगीनों से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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