*मुक्त-ग़ज़ल : 209 - तूने जिसे कहा था

तूने जिसे कहा था आब ; आब ही सुना ॥
मैंने न उसको जह्र या शराब ही सुना ॥
तूने जिसे कहा था सच नहीं है ये , कभी
मैंने भी उसको दिन का एक ख़्वाब ही सुना ॥
तूने जिसे कहा था मुझको पढ़ने ग़ौर से ;
मैंने भी उसको आँख कब ? किताब ही सुना ॥
हिन्दी में तूने मुझको चाँद चाँद जब कहा ;
उर्दू में मैंने उसको माहताब ही सुना ॥
इंसाफ़ के लिए जो तूने रास्ता कहा ;
मैंने भी उसका नाम इन्क़लाब ही सुना ॥
तूने अदब से भी न जब पुकारा तब भी सच ;
मैंने उसे हुज़ूर या जनाब ही सुना ॥
( आब = पानी ,जह्र = विष , माहताब = चाँद , इन्क़लाब = क्रांति , हुज़ूर या जनाब = एक आदर युक्त सम्बोधन  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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