*मुक्त-ग़ज़ल : 208 : दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥

खूबसूरत जो यार होते हैं ;
दिल चुरा के फ़रार होते हैं 1॥ 
तीर चल जाएँ फिर कहाँ रुकते ,
आर होते या पार होते हैं 2॥ 
हमपे होते नहीं जो क़ुर्बां हम ,
उनपे अक्सर निसार होते हैं 3॥ 
रातें होती हैं सच वहाँ दिन सी ,
और शब से नहार होते हैं4॥ 
सच में होते हैं वो जो ताक़तवर ,
मुँह के वो ख़ाकसार होते हैं 5॥ 
उन से होते हैं लोग गिनती के ,
अपने जैसे हज़ार होते हैं 6॥ 
शक्लो सूरत के ताज सच पूछो ,
दिल में कच्ची मज़ार होते हैं 7॥ 
कोई बतलाए कैसे रातों रात ,
बैलगाड़ी से कार होते हैं ?8॥ 
होने को क्या न होवे दुनिया में ,
गाय के सिंह शिकार होते हैं ?9॥ 
उन पे क्या एतबार पापड़ से ,
जिनके क़समो क़रार होते हैं ?10॥ 
वो भी चलते हैं रुक नहीं जाते ,
जिनकी राहों में ख़ार होते हैं 11॥ 
हुस्न पे उनके इक दफ़ा न फ़िदा ,
सब के दिल सौ सौ बार होते हैं12॥ 
झोपड़ी से भी तोहफ़े उनके ,
ताज से यादगार होते हैं13॥ 
साथ उनके खजाँ के मौसम भी ,
सच में फ़स्ले बहार होते हैं14॥ 
उनकी ठोकर से मीठे दर्या भी ,
सूखकर रेगज़ार होते हैं 15॥ 
( शब = रात , नहार = दिन , ख़ाकसार = विनम्र , ख़ार = काँटा , खजाँ = पतझड़ , रेगज़ार = मरुस्थल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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