*मुक्त-ग़ज़ल : 207 : मंदिर नहीं मिला ॥

बाहर से कोई ढूँढे भी काफ़िर नहीं मिला ॥
अंदर किसी के एक भी मंदिर नहीं मिला ॥
पर्वत सा मत हिलो जो मुझे कह रहा था कल ,
आँधी में वो भी झण्डे सा स्थिर नहीं मिला ॥
हों हाथ , पैर , सीना औ गर्दन सुराही सी ,
किस काम की वो देह जिसे सिर नहीं मिला ?
आग़ाज़ हस्बे मर्ज़ी न पाया ये ख़ैर थी ,
अफ़्सोस क्यों पसंद का आख़िर नहीं मिला ?
इंसानियत से था वो लबालब ख़ुदा क़सम ,
शैतान उसके जैसा कहीं फिर मिला नहीं ॥
( काफ़िर = किसी को न मानने वाला ।  आग़ाज़ = प्रारम्भ, जन्म । हस्बे मर्ज़ी = मनोवांछित । आख़िर = अंत , मृत्यु )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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