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Showing posts from August, 2016

*मुक्त ग़ज़ल : 211 : बेवफ़ा कलमुँहा ,मुँहजला इश्क़ है ॥

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बेवफ़ा कलमुँहा , मुँहजला इश्क़ है ॥ किसने तुझसे कहा इक बला इश्क़ है ?1॥  हैं अगर कोई तो ; वो हैं आशिक़ बुरे , इश्क़ को मत बुरा कह ; भला इश्क़ है ॥2॥  है सुपाड़ी के जैसा कभी तो कभी , इक पके आम सा पिलपिला इश्क़ है ॥3॥  है मुंहासा कभी चाँद पे दाग़ सा , तो कभी तलवे का आबला इश्क़ है ॥4॥  आये अपनी पे जब सूर्य पर नाँ जले , नाँ हिमालय पे चढ़के गला इश्क़ है ॥5॥  है कभी बस ज़ुबाँ पे थिरकता हुआ , औ’ कभी दिल ही दिल में पला इश्क़ है ॥6॥  है कभी एक लू का थपेड़ा कभी , बाद गर्मी के पहला झला इश्क़ है ॥7॥  हुस्न के दर पे धरना दे बैठा हुआ , टालने से कभी नाँ टला इश्क़ है ॥8॥  है कभी ख़ुद के हाथों तराशा हुआ , औ’ कभी एक साँचा ढला इश्क़ है ॥9॥  नाँ कभी शाहराहों न गलियों पे बस , अपनी मंज़िल की रह पे चला इश्क़ है ॥10॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त ग़ज़ल : 210 - सवाल इक पूछना है

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सफ़र कर आ रहे हैं जो समंदर का महीनों से ; किनारे आ के भी उतरें न अब वो ही सफ़ीनों से ॥ यक़ायक़ क्या हुआ जिनके लगे रहते थे पीछे ही ; छुड़ाते दिख रहे पीछा वही अब उन हसीनों से ॥ हुए वो दिन हवा जब बाज सी नज़रें वो रखते थे ; उन्हें दिखता नहीं अब पास का भी दूरबीनों से ॥ कि जो गुमनाम होते हैं क्या वो इंसाँ नहीं होते ? सवाल इक पूछना है मुझको सारे नामचीनों से ॥ मोहब्बत से चले थे पालने नागों को बाँहों में ; फ़क़त दो दिन में डस मारा मुओं ने आस्तीनों से ॥ मोहब्बत के बराबर वज़्न कोई भी नहीं होता ; न दौलत से , न सीमोज़र न ये तुलती नगीनों से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

स्वतन्त्रता दिवस

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स्वतन्त्रता दिवस के
रंगारंग कार्यक्रमों के उपरांत कागज़ अथवा पन्नी के छोटे-छोटे
तिरंगों को यहाँ वहाँ फेंककर हिंदुस्तान के सम्मान
को न कुचलें । - डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 209 - तूने जिसे कहा था

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तूने जिसे कहा था आब ; आब ही सुना ॥ मैंने न उसको जह्र या शराब ही सुना ॥ तूने जिसे कहा था सच नहीं है ये , कभी मैंने भी उसको दिन का एक ख़्वाब ही सुना ॥ तूने जिसे कहा था मुझको पढ़ने ग़ौर से ; मैंने भी उसको आँख कब ? किताब ही सुना ॥ हिन्दी में तूने मुझको चाँद चाँद जब कहा ; उर्दू में मैंने उसको माहताब ही सुना ॥ इंसाफ़ के लिए जो तूने रास्ता कहा ; मैंने भी उसका नाम इन्क़लाब ही सुना ॥ तूने अदब से भी न जब पुकारा तब भी सच ; मैंने उसे हुज़ूर या जनाब ही सुना ॥ ( आब = पानी ,जह्र = विष , माहताब = चाँद , इन्क़लाब = क्रांति , हुज़ूर या जनाब = एक आदर युक्त सम्बोधन  ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 856 - माथे धर वंदन होता ॥

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प्रातः के पश्चात सांध्य भी माथे धर वंदन होता ॥ तुलसी की मानस का घर-घर में सस्वर वाचन होता ॥ पढ़कर मनोरंजन ना कर यदि हृदयंगम सब करते तो , मर्यादाओं का जग में सच क्योंकर उल्लंघन होता ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 208 : दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥

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खूबसूरत जो यार होते हैं ; दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥1॥  तीर चल जाएँ फिर कहाँ रुकते , आर होते या पार होते हैं ॥2॥  हमपे होते नहीं जो क़ुर्बां हम , उनपे अक्सर निसार होते हैं ॥3॥  रातें होती हैं सच वहाँ दिन सी , और शब से नहार होते हैं ॥4॥  सच में होते हैं वो जो ताक़तवर , मुँह के वो ख़ाकसार होते हैं ॥5॥  उन से होते हैं लोग गिनती के , अपने जैसे हज़ार होते हैं ॥6॥  शक्लो सूरत के ताज सच पूछो , दिल में कच्ची मज़ार होते हैं ॥7॥  कोई बतलाए कैसे रातों रात , बैलगाड़ी से कार होते हैं ?8॥  होने को क्या न होवे दुनिया में , गाय के सिंह शिकार होते हैं?9॥  उन पे क्या एतबार पापड़ से , जिनके क़समो क़रार होते हैं?10॥  वो भी चलते हैं रुक नहीं जाते , जिनकी राहों में ख़ार होते हैं ॥11॥  हुस्न पे उनके इक दफ़ा न फ़िदा , सब के दिल सौ सौ बार होते हैं ॥12॥  झोपड़ी से भी तोहफ़े उनके , ताज से यादगार होते हैं ॥13॥  साथ उनके खजाँ के मौसम भी

*मुक्त-मुक्तक : 855 - मीठी झील तक गए ॥

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कब अपने शहर की ही मीठी झील तक गए ॥ दो - चार - छः नहीं हजारों मील तक गए ॥ प्यासे थे इस क़दर कि सब कुएँ , तलाव पी ; गंगो–जमन , चनाब , मिश्र – नील तक गए ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 207 : मंदिर नहीं मिला ॥

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बाहर से कोई ढूँढे भी काफ़िर नहीं मिला ॥ अंदर किसी के एक भी मंदिर नहीं मिला ॥ पर्वत सा मत हिलो जो मुझे कह रहा था कल , आँधी में वो भी झण्डे सा स्थिर नहीं मिला ॥ हों हाथ , पैर , सीना औ’ गर्दन सुराही सी , किस काम की वो देह जिसे सिर नहीं मिला ? आग़ाज़ हस्बे मर्ज़ी न पाया ये ख़ैर थी , अफ़्सोस क्यों पसंद का आख़िर नहीं मिला ? इंसानियत से था वो लबालब ख़ुदा क़सम , शैतान उसके जैसा कहीं फिर मिला नहीं ॥ ( काफ़िर = किसी को न मानने वाला ।  आग़ाज़ = प्रारम्भ, जन्म । हस्बे मर्ज़ी = मनोवांछित । आख़िर = अंत , मृत्यु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 854 - इक आदमी लोहे का

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टूटा न जो चाबुक की दमादम सड़ाक से ॥ टूटा न जो बिजली की भयंकर कड़ाक से ॥ इक आदमी लोहे का तेरी खा के गालियाँ , मानिंदे बुते शीशा वो टूटा तड़ाक से ॥ ( दमादम = निरंतर , मानिंदे बुते शीशा = काँच के पुतले जैसा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 853 - तड़पूँ तुम्हारे वास्ते

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तड़पूँ तुम्हारे वास्ते , न आह अब भरूँ ॥ हूँ तो निसार अब भी पर न पहले सा मरूँ ॥ विस्मृत नहीं किया है किन्तु ये भी सत्य है , अब नाम का तुम्हारे जाप मैं नहीं करूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति