*मुक्त-मुक्तक : 851 - वक़्त-ए-आख़िर




वक़्त-ए-आख़िर सही रे एक बार ही मुझको , अपने सीने से तू लगा के माफ़ कर देना ॥
मेरी ख़ातिर जो तेरे दिल में मैल तारी है , कर के मुझको हलाल ख़ूँ से साफ़ कर देना ॥
झूठ बदनाम इस क़दर हुआ कि दुनिया को , अब न क़ाबिल बचा हूँ मुँह तलक दिखाने के ।
मुझ सरेआम बेलिबास को चलते-चलते , इक कफ़न जानेजाँ काला लिहाफ़ कर देना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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