*मुक्त-मुक्तक : 849 - तुमतुराक़



वस्ल महबूब से होता , नहीं फ़िराक़ होता ॥
इश्क़ मेरा न रोते – रोते यों हलाक होता ॥
गर वो होता ग़रीब या कम-ज-कम उस जैसा ,
बल्कि उससे भी बढ़के मेरा तुमतुराक़ होता ॥
( वस्ल = मिलन , फ़िराक़ = बिछोह , हलाक = हत , तुमतुराक़ = वैभव )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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