*मुक्त-ग़ज़ल : 203 - रावण भी रहता है मुझमें !!


तू क्या जाने क्या है मुझमें ?
सिंह है या चूहा है मुझमें !!
इत सीतापति बसते हैं उत ,
रावण भी रहता है मुझमें !!
बूढ़ा हूँ पर सच नटखट सा ,
अब भी इक बच्चा है मुझमें !!
मुझको हँसते कम ही पाना ,
इक चिर दुःख बसता है मुझमें !!
मुँह खोलूँ तो उगलूँ लपटें ,
इक जंगल जलता है मुझमें !!
तू चाहे कुछ वैसा , कुछ –कुछ
मैं चाहूँ वैसा है मुझमें !!
तुझमें सब कुछ चुंबक जैसा ,
कुछ – कुछ लोहा सा है मुझमें !!
तू तज आप कहें सब मुझको ,
इतना कुछ बदला है मुझमें !!
लगता हूँ मधु का कलसा पर ,
विष ही विष सिमटा है मुझमें !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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