*मुक्त-ग़ज़ल : 202 - दीप राग हँसते हैं ॥



लगा के वो मेरी खुशियों में आग हँसते हैं ॥
गिरा के खाई में छुप–छुप के भाग हँसते हैं ॥
पिला के मुझको ज़ह्र मौत की सुला के नींद ,
शराब पी के रात भर वो जाग हँसते हैं ॥
ख़मोश रहके भी डसते हैं और बोलें तो ,
जुबाँ के उनकी काट-काट नाग हँसते हैं ॥
मलार सुनने मचलते हैं कान जब मेरे ,
सुना के मुझको तब वो दीप राग हँसते हैं ॥
बुला के शेर को दावत पे तश्तरी भर-भर ,
परोस ताज़ा घास-पात-साग हँसते हैं ॥
हैं इस क़दर वो दिवाने नुकीले काँटों के ,
उजाड़-उजाड़ के फूलों के बाग हँसते हैं ॥
फ़रिश्ते होते हैं गिरतों को थामने वाले ,
गिरा-गिरा के तो बस लोग-बाग हँसते हैं ॥
( मलार = वर्षा ऋतु के समय गाया जाने वाला राग , मल्हार )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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