Tuesday, July 12, 2016

ग़ज़ल : 202 - दीप राग हँसते हैं ॥



लगा के वो मेरी खुशियों में आग हँसते हैं ॥
गिरा के खाई में छुप–छुप के भाग हँसते हैं ॥
पिला के ज़ह्र मुझको मौत की सुला के नींद ,
शराब पी के सारी रात जाग हँसते हैं ॥
ख़मोश रहके भी डसते हैं और बोलें तो ,
जुबाँ के उनकी काले , काट , नाग हँसते हैं ॥
मलार सुनने मेरे कान जब मचलते हैं ,
सुना के मुझको तब वो दीप राग हँसते हैं ॥
बुला के शेर को दावत पे तश्तरी भर-भर ,
परोस घास-भूसा-पात-साग हँसते हैं ॥
हैं इस क़दर वो दीवाने नुकीले काँटों के ,
उजाड़-उजाड़ के फूलों के बाग़ हँसते हैं ॥
फ़रिश्ते होते हैं गिरतों को थामने वाले ,
गिरा-गिरा के तो बस लोग-बाग हँसते हैं ॥
( मलार = वर्षा ऋतु के समय गाया जाने वाला राग , मल्हार )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

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