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Showing posts from July, 2016

ग़ज़ल : 206 - लाशों से शर्मिंदा हूँ ॥

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लाशों से शर्मिंदा हूँ ॥ मुर्दों सा जो ज़िंदा हूँ ॥ पर औ’ पाँव कटे तो क्या , ज़ात का एक परिंदा हूँ ॥ बेघर हूँ तो क्या उनके , दिल का तो बाशिंदा हूँ ॥ अँधियारा भागे मुझसे , ऐसा मैं ताबिंदा हूँ ॥ लगता हूँ साहब जैसा , वैसे मैं कारिंदा हूँ ॥ कल मैं उनका माज़ी था , औ’ कल का आइंदा हूँ ॥ तारीफ़ें सब पीठों पर , मुँह पे करता निंदा हूँ ॥ वैसे हूँ जाँबख़्श मगर , गाह ब गाह दरिंदा हूँ ॥ ( ताबिंदा =चमकने वाला ,कारिंदा = कर्मचारी ,माज़ी = भूतकाल ,आइंदा = भविष्य ,जाँबख़्श = मरने से बचाने वाला ,गाह ब गाह = कभी कभी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 205 - दिल लगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

हथेली पर ही सरसों को जमाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ कि बिन पिघलाए पत्थर को बहाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ नहीं हैं आँखें जिसकी और न जिसके कान भी उसको , गले को फाड़कर अपने बुलाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ जड़ें अपनी जमाने में जहाँ पे नागफणियाँ भी उखड़ जाएँ , वहाँ तुलसी उगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ कहाँ तक हुस्न से उसके बचाऊँ अपनी आँखों को , कि आख़िरकार उससे दिल लगाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ जो सुलगा दे नदी को वो उसे ही अपना दिल देगी , यही सुनकर समंदर को जलाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ हमेशा आँख में आँसू भरे वो घूमता रहता , उसे कर मस्ख़री थोड़ा हँसाने चल पड़ा हूँ मैं ॥ दमे आख़िर ज़माने से जो दिल में दफ़्न है इक राज़ , उसे इक राज़दाँ को अब बताने चल पड़ा हूँ मैं ॥ न रेगिस्तान में पीने को भी पानी मयस्सर था , हुई बरसात तो प्यासा नहाने चल पड़ा हूँ मैं ॥

*मुक्त-ग़ज़ल : 204 - छटपटाकर रह गया हूँ ॥

मात बच्चों से ही खाकर रह गया हूँ ॥ तिलमिलाकर , छटपटाकर रह गया हूँ ॥ आर्ज़ू तो थी कि सोना ही उठाऊँ , हाथ मिट्टी ही उठाकर रह गया हूँ ॥ मो’तबर कोई नहीं जब मिल सका तो , राज़ सब दिल में दबाकर रह गया हूँ ॥ आँच कुछ माँगी है उसने तापने को , ख़ुद को बीड़ी सा जलाकर रह गया हूँ ॥ पूछते थे वो कि मैं क्या हूँ ? कहूँ क्या ? आदमी हूँ ये बताकर रह गया हूँ ॥ उस हसीं की इक हँसी पर उम्र भर की , मैं कमाई को लुटाकर रह गया हूँ ॥ इस क़दर मुफ़्लिस हूँ मैं जाँ को बचाने , भूख में ख़ुद को चबाकर रह गया हूँ ॥ ( आर्ज़ू = कामना , मो’तबर = विश्वसनीय , हसीं = सुंदर , मुफ़्लिस = ग़रीब )

ग़ज़ल : 203 - रावण भी रहता है मुझमें !!

तू क्या जाने क्या है मुझमें ? सिंह है या चूहा है मुझमें !! इत बसते हैं सीतापति उत , रावण भी रहता है मुझमें !! बूढ़ा हूँ पर सच नटखट सा , अब भी इक बच्चा है मुझमें !! मुझको हँसते कम ही पाना , इक चिर दुख बसता है मुझमें !! मुँह खोलूँ तो उगलूँ लपटें , इक जंगल जलता है मुझमें !! तू चाहे कुछ वैसा , कुछ-कुछ मैं चाहूँ वैसा है मुझमें !! तुझमें सब कुछ चुंबक जैसा , कुछ-कुछ लोहा सा है मुझमें !! ‘तू’ तज ‘आप’ कहें सब मुझको , इतना कुछ बदला है मुझमें !!

मत हँसें !

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[ चित्र google search /http://www.express.co.uk/से साभार ] चाहकर भी हो न पाते छरहरे , हम पे क़ुदरत का है ये ज़ुल्मो-सितम ॥
हम पे हँसने की जगह करना दुआ , कैसे भी हो ? हो हमारा वज़्न कम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 852 - दया , करुणा , अहिंसा

हाँ दया , करुणा , अहिंसा का सतत उपदेश दे ॥ किन्तु मत प्रकृति विरोधी रात - दिन संदेश दे ॥ वृद्ध हो , भूखा हो तेरा दास भी हो तो भी मत , घास चरने का कभी भी शेर को आदेश दे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 851 - वक़्त-ए-आख़िर

वक़्त-ए-आख़िर सही रे एक बार ही मुझको ,
अपने सीने से तू लगा के माफ़ कर देना ।। मेरी ख़ातिर जो तेरे दिल में मैल है तारी ,
कर के मुझको हलाल ख़ूँ से साफ़ कर देना ।। झूठ बदनाम इस क़दर हुआ कि दुनिया को ,
अब न क़ाबिल बचा हूँ मुँह तलक दिखाने के ; मुझ सरेआम बेलिबास को चले-चलते ,
इक कफ़न जानेजाँ सियह लिहाफ़ कर देना ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 202 - दीप राग हँसते हैं ॥

लगा के वो मेरी खुशियों में आग हँसते हैं ॥ गिरा के खाई में छुप–छुप के भाग हँसते हैं ॥ पिला के ज़ह्र मुझको मौत की सुला के नींद , शराब पी के सारी रात जाग हँसते हैं ॥ ख़मोश रहके भी डसते हैं और बोलें तो , जुबाँ के उनकी काले , काट , नाग हँसते हैं ॥ मलार सुनने मेरे कान जब मचलते हैं , सुना के मुझको तब वो दीप राग हँसते हैं ॥ बुला के शेर को दावत पे तश्तरी भर-भर , परोस घास-भूसा-पात-साग हँसते हैं ॥ हैं इस क़दर वो दीवाने नुकीले काँटों के , उजाड़-उजाड़ के फूलों के बाग़ हँसते हैं ॥ फ़रिश्ते होते हैं गिरतों को थामने वाले , गिरा-गिरा के तो बस लोग-बाग हँसते हैं ॥ ( मलार = वर्षा ऋतु के समय गाया जाने वाला राग , मल्हार )

मुक्तक : 850 - तन से सब उतार के ॥

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[ चित्र googlesearch से साभार ]
कर रहा है स्नान कोई तन से सब उतार के ॥ कोई भी न देखता ये सोच ये विचार के ॥ उसके इस भरोसे को न मार डाल इस तरह , झाँक-झाँक के तू गुप्त छिद्र से किवार के ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 849 - तुमतुराक़

वस्ल महबूब से होता , नहीं फ़िराक़ होता ॥ इश्क़ मेरा न सिसकते हुए हलाक होता ॥ हाँ अगर होता वो मुफ़्लिस या उसके जैसा मेरा , बल्कि उससे भी कहीं बढ़के तुमतुराक़ होता ॥ ( वस्ल = मिलन , फ़िराक़ = बिछोह , हलाक = हत , तुमतुराक़ = वैभव ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 848 - मग़्ज़ , दिल , अक़्ल

मग़्ज़,दिल,अक़्ल सभी तीन बिछा रक्खे थे ॥ फूल चुन बाग़ सेरंगीन बिछा रक्खे थे ॥ तेरे आने की हर इकराह पे मैंने डग-डग, अपनी आँखों के दोक़ालीन बिछा रक्खे थे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति


ग़ज़ल : 201 - सच नहीं अच्छी कहानी चाहिए ॥

बस तुम्हारी मुँहज़ुबानी चाहिए ॥ सच नहीं अच्छी कहानी चाहिए ॥ आख़री ख़्वाहिश _जो मेरी खो गई फिर से वापस वो जवानी चाहिए ॥ मुझको तालाबों , कुओं , झीलों में भी , नदियों के जैसी रवानी चाहिए ॥ लू-लपट ,हिमपात ,फटते मेघ नाँ , मुझको सब ऋतुएँ सुहानी चाहिए ॥ याद तो आती है तेरी रोज़ ही , तुझको भी तशरीफ़ लानी चाहिए ॥ दे चुका तुझको मैं क्या-क्या तोहफ़े , अब मुझे तुझसे निशानी चाहिए ॥ दोस्त दो ,दुश्मन दो लेकिन शर्त है , मुझको जानी ,सिर्फ़ जानी चाहिए ॥ प्यास पानी से मेरी बुझती न अब ,

गीत : 46 - प्रेम धुन में प्रीत लय में

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प्रेम धुन में प्रीत लय में गुनगुनाएगी ॥ लेखनी मेरी उसी के गीत गाएगी ॥ दृष्टि में मेरी सदा रहता है मुख उसका । और मुझको ताकते रहना है सुख उसका । मैं भरी बरसात में भी यदि पुकारूँ तो , छोड़कर सब मुझसे मिलने दौड़ आएगी ॥ लेखनी मेरी उसी के गीत गाएगी ॥ मैं उसे राई सा चाहूँ वो पहाड़ों सा । मैं उसे डमरू सा वो चाहे नगाड़ों सा । यदि करूँ उससे निवेदन एक चुंबन का , वो मेरी बाहों में आकर झूल जाएगी ॥ लेखनी मेरी उसी के गीत गाएगी ॥ गर्त में जब भी निराशा के मैं फँस जाऊँ । ठोस दलदल में हताशा के मैं धँस जाऊँ ।